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जानिए अमावस्या व्रत के लाभ और व्रत विधि

अमावस्या का महत्व

 'अमावस्या'  अर्थात महीने का वह दिन जब चन्द्रमा प्रकाशहीन होता है।  हिन्दू पंचांग के अनुसार एक माह में दो पक्ष होते है।  कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष।  

पूर्णिमा हर माह का अन्तिम दिन होता है उसके अगले दिन से चन्द्रमा की कलाएँ घटना शुरु हो जाती है।  इसे कृष्ण पक्ष कहते है।  कृष्ण पक्ष के अन्तिम दिन चन्द्रमा पूरी तरह अदृश्य हो जाता है, उस दिन को ही अमावस्या कहते है।


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अमावस्या के दिन पवित्र नदियों में स्नान करना, दान, हवन, पूजा तथा व्रत करना बहुत शुभ तथा पुण्यदायी माना जाता है।  अमावस्या के दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है।  यह दिन पितरों की पूजा के लिये भी विशेष है।  

प्रति माह अमावस्या के दिन अपने पितरों का पूजन करना तथा उनके नाम का भोजन निकलना शास्त्र धर्म है।  जो लोग हर अमावस्या पर पितरो का तर्पण नही भी करते है वह लोग श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को पितरों का तर्पण अवश्य करते है।  



अमावस्या व्रत के लाभ 

इस दिन व्रत रखने के क्या लाभ है आइए जानते है-
चन्द्र ग्रह की प्रकृति शीतल है, यह तो सभी जानते है।  चन्द्रमा  शीतल इसलिये है क्योंकि वह जल का कारक है।  हज़ारों वर्षों पूर्व ही ज्योतिष विज्ञान यह बता चुका है, कि  चन्द्रमा जल का कारक होता है और अब तो आधुनिक  वैज्ञानिको को भी यह जानकारी प्राप्त हो गई है, कि चन्द्रमा पर जल का अस्तित्व है। 

चन्द्रमा के शीतलता के गुण के कारण यह मनुष्य के मन में शान्ति उत्पन्न करता है।  जिनकी कुंडली में चन्द्रमा मजबूत स्थिति में होता है, वह लोग बहुत शान्त स्वभाव के होते है।  

चन्द्र ग्रह  को अपनी कुंडली में मज़बूत करने के लिये  ज्योतिष कुछ उपाय बताता है, जैसे अधिक पानी पीना,  चांदी का कोई आभूषण पहनना, सफेद रंग का प्रयोग करना।  

चांदी भी ठंडी प्रकृति की धातु मानी जाती है, इसलिये चांदी चंद्र ग्रह को मज़बूत बनाती है।  सफेद रंग भी मन को शीतलता प्रदान करता है इसीलिये इसका प्रयोग भी चन्द्रमा को प्रभावी बनाने के लिये किया जाता है।

कहने का मतलब यह है कि चन्द्रमा का शीतल प्रकाश हमारे मन को शान्ति देता है।  परंतु अमावस्या के दिन जब चन्द्रमा का शान्तिमयी प्रकाश पृथ्वी को प्राप्त नही होता तब इसका नकारात्मक प्रभाव मनुष्यों के मन पर पड़ सकता है। 

इसी बात को ध्यान में रखकर अमावस्या के दिन नदियों में स्नान करने तथा व्रत पूजा करने के विशेष नियम बनाए गए है।  नदियों के जल के सम्पर्क में आने से मनुष्य के मन पर चन्द्रमा का सकारात्मक प्रभाव बना रहेगा तथा व्रत, पूजा आदि मनुष्य को सात्विक बने रहने में सहायता करेंगे। 

इसके अतिरिक्त ऐसा भी माना जाता है, कि चन्द्रमा का प्रकाश पृथ्वी को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है, इसलिये अमावस्या की  अन्धकारमयी रात्रि में नकारात्मक ऊर्जाएं प्रभावी हो जाती है।  

व्रत तथा पूजा मनुष्य पर  नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव नही होने देती इसलिये भी इस दिन व्रत तथा पूजा करना उत्तम है।

अमावस्या के देवता पितृ देवता है।  इसलिये जो लोग इस दिन व्रत रखते है तथा पितरों का तर्पण तथा दान आदि करतें है,  उनके पितृ उनसे प्रसन्न होते है, उनकी कुंडली में यदि पितृ दोष हो तो वह दोष भी इस दिन के व्रत से धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।  

यदि कुंडली में पितृ दोष होता है तो जीवन में बहुत रुकावटे आती है।  इसलिये ऐसे लोगो को यह व्रत अवश्य करना चाहियें।


वर्ष की कुछ विशेष अमावस्या

वर्ष की कुछ विशेष अमावस्याओं के नाम इस प्रकार है। सोमवती अमावस्या, भौमवति अमावस्या, शनि अमावस्या, मौनी अमावस्या हरियाली अमावस्या, श्राद्धी अमावस्या, दीवाली अमावस्या।
इनके अलावा बाकी सभी अमावस्या माह के नाम से ही जानी जाती है।

सोमवती अमावस्या

सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते है।  सोम का अर्थ चन्द्रमा ही है तथा  चन्द्रमा के स्वामी भगवान शिव है जो उन्हें शीश पर धारण किये हुए है।  

इसलिये चन्द्रमा को अपनी कुंडली में प्रभावी बनाने के लिये सोमवती अमावस्या को व्रत अवश्य रखना चाहियें तथा भगवान शिव की पूजा करनी चाहियें।  

इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक करें। सोमवती अमावस्या को स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिये व्रत रखती है। 


भौमवती अमावस्या

मंगलवार को पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या कहते है। इस दिन हनुमान जी तथा मंगल ग्रह की पूजा करने से कुंडली में मंगल ग्रह सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।  

इस दिन हनुमान चालीसा का जाप करें तथा संध्या के समय पीपल की जड़ के पास तिल के तेल का दीपक जलाएं।  यदि कुंडली में मंगल दोष हो तो मंगलवार के व्रत के साथ ही भौमवती अमावस्या का व्रत भी करना चाहियें।  इस दिन नमक न खाएं।

मंगल दोष के उपाय के लिये तथा मंगल देव को प्रसन्न करने के लिये इस दिन मंगल देव के मंत्र का जाप करें।  
मंगल देव का मंत्र है - 'ऊँ अं अंगारकाय नम:'।



शनि अमावस्या

शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को शनि अमावस्या कहते है।  यदि कुंडली पर शनि ग्रह का नकारात्मक प्रभाव हो या राशि पर साड़सती चल रही हो तो इस दिन व्रत रखना चाहियें। इस दिन शिवलिंग पर जल में काले तिल डाल कर जल चढ़ाना चाहियें।

शनि अमावस्या के दिन काले खाद्य पदार्थों का दान करें, जैसे  उड़द, उड़द की दाल, काले चने तथा सरसो का तेल।
शनि अमावस्या के दिन संध्या समय पीपल के नीचे सरसों के तेल का दिया जलाएं। 

शनि ग्रह के सकारात्मक प्रभाव के लिये इस दिन पीपल के नीचे बैठ कर कुछ देर ध्यान करें तथा शनिदेव के मंत्र का जाप करें।
शनि देव का मंत्र है -  'ऊँ शं शनैश्चराय नम:'



हरियाली अमावस्या

श्रावण मास की अमावस्या को हरियाली अमावस्या कहते है।  इस दिन पेड़ों की विशेष पूजा का मह्त्व माना जाता है।  पीपल, नीम, बरगद, आंवला, तुलसी जैसे उपयोगी पेड़-पौधे हिन्दू धर्म में पूजनीय माने गए है।  
पीपल को विशेष रूप से देवालय स्वरूप माना गया है।   हरियाली अमावस्या के दिन पीपल की पूजा के साथ-साथ अन्य पेड़-पौधों की भी पूजा करनी चाहियें।  

इस दिन पेड़ लगाना बहुत पुण्य का कार्य माना जाता है।  श्रावण का माह वर्षा ऋतु के समय पड़ता है।  यह ऋतु पौधो की वृद्धि के लिये अनुकूल ऋतु है।  

इसलिये इस माह में पेड़-पौधों का बीजारोपण करने पर वह शीघ्र ही अंकुरित हो जाते है।  धार्मिक दृष्टिकोण के साथ ही अपने पर्यावरण की सुरक्षा के लिये भी इस दिन पेड़ लगाना उत्तम कार्य है। 



मौनी अमावस्या

यह अमावस्या माघ के महीने में आती है।  इस दिन गंगा स्नान के लिये गंगा नदी के सभी तटों पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।  इस दिन मौन व्रत का विशेष मह्त्व माना जाता है।  इस अमावस्या को व्रत-उपवास के साथ ही मौन व्रत करने से आत्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।


पितृपक्ष अमावस्या

आश्विन माह के कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष कहते है।  पितृपक्ष की अमावस्या के दिन पितरों का श्राद्ध कर्म तथा तर्पण आदि किया जाता है।  भाद्रपद मास की पूर्णिमा से पितृपक्ष  आरम्भ हो जाता है।  तथा यह आश्विन की अमावस्या पर समाप्त होता है।  

शास्त्रों में पितृपक्ष पितरों के श्राद्ध-कर्म के लिये निश्चित किया गया है।  यदि हर अमावस्या को पितरो की पूजा न भी करें तो भी पितृपक्ष में पितृ पूजा अवश्य करनी चाहियें।  

पितृ पक्ष में व्यक्ति की मृत्यु की तिथि के अनुसार उसका श्राद्ध किया जाता है तथा अन्तिम दिन अमावस्या को सभी भूले-बिसरे पूर्वजों को याद करके उनका श्राद्ध किया जाता है।

इस दिन ब्राह्मणो को भोजन करायें तथा दक्षिणा प्रदान करें।  इस दिन ब्राह्मणो को दक्षिणा में फल, वस्त्र, बर्तन, चप्पले आदि आवश्यकता की वस्तुएं यथासम्भव देनी चाहिये।

इस दिन गाय, कुत्ते, कौवे को भोजन खिलाएं तथा चींटियों को आटा डालें। 

दीवाली अमावस्या

कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली का त्यौहार होता है, इसलिये यह अमावस्या भी विशेष मानी जाती है।  इस दिन भी पितृ पूजा की जाती है। इस दिन सुबह सर्वप्रथम पितरों के नाम का भोजन निकाले।

इस अमावस्या की रात्रि को सामान्यत: लक्ष्मी गणेश का पूजन तो किया ही जाता है, परंतु काली माता के पूजन के लिये भी यह अमावस्या विशेष है।  तंत्र साधना करने वाले साधक इस दिन काली माता की विशेष साधना करते है। 

अमावस्या व्रत विधि

इस दिन यदि संभव हो तो गंगा जी या किसी भी नदी पर जा कर स्नान करें।  यदि किसी भी नदी पर जाना संभव न हो तो घर में ही स्नान के जल में थोड़ा सा गंगा जल डाल कर स्नान कर लें। 

इस दिन पूरे घर में गंगा जल का छिड़काव करें।

अमावस्या के दिन शिव-पार्वती तथा विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिये। 
इस दिन पीपल का पूजन अवश्य करें, क्योंकि पीपल में त्रिदेवों का वास माना जाता है। 

पीपल पर जल चढ़ाएं तथा पीपल की सात परिक्रमा करें तथा उसके तने पर कच्चा सूत बांधे। 

पीपल के पास आटे का दिया जला कर रखें।

इस दिन तुलसी के पास घी का दीपक रखें तथा तुलसी की 108 परिक्रमा लगायें।

परिक्रमा के साथ भगवान विष्णु का  'ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय'  मंत्र का जाप करें।

इस दिन पितरों को स्मरण करके घर के दक्षिण की ओर मुख करके जल अर्पित करें।

इस दिन ब्राह्मणो को भोजन करायें तथा दक्षिणा दें।

अमावस्या के दिन पितरो के लिये भोजन में सामान्यत: खीर तथा पूरी बनाई जाती है। 

अमावस्या के दिन खीर का विशेष मह्त्व है, खीर दूध तथा चावल से बनती है।  दूध और चावल दोनो सफेद खाद्य पदार्थ है, इसलिये कुंडली में चन्द्रमा को  सकारात्मक रूप से प्रभावशाली बनाने में सहायता करते है।

इस दिन गाय, कुत्ते, कौवे को भोजन प्रदान करें तथा चींटियों को आटा डालें। 

व्रत रखने वाले व्यक्तियों को संध्याकाल में एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहियें।
इस दिन तामसिक भोजन तथा मदिरा ग्रहण न करें।

जो लोग व्रत नही रखते हो, उन्हें भी अमावस्या के दिन सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहियें।





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