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बुधवार व्रत की कथा और व्रत विधि

बुधवार व्रत का महत्व

सप्ताह के सभी दिनों के नाम ग्रहों के नाम पर आधारित है। सप्ताह के तीसरे दिन बुधवार के दिन का नाम बुद्ध ग्रह के नाम पर आधारित है।  

बुद्धवार का व्रत कुंडली में बुद्ध ग्रह के शुभ प्रभाव की प्राप्ति के लिये किया जाता है।  बुद्ध ग्रह मनुष्य की बुद्धि को प्रभावित करता है।  अर्थात, उत्तम बुद्धि के लिये कुंडली में बुद्ध ग्रह का सकारात्मक प्रभाव होना आवश्यक है।  

बुद्धि के बिना मनुष्य पशु के समान है, इसलिये अपनी बुद्धि को उन्नत करने के लिये बुद्ध देव की पूजा तथा व्रत किया जाता है।  

इस दिन गणेश जी की पूजा करने का भी विधान है, इसका कारण यह है कि गणेश जी बुद्धि के देवता है।  इसलिये बुद्धि के विकास के लिये बुधवार के दिन गणेश जी की पूजा अवश्य करनी चाहियें।
इस व्रत से जुड़ी हुई एक पौराणिक कथा नीचे दी जा रही है।


budhvar vrat



बुधवार व्रत कथा

एक नगर में एक साहुकार रहता था।  उसके पास अपार धन -सम्पदा थी।  उसने एक सुंदर, रूपवती तथा गुणवती कन्या से विवाह कर लिया। 

विवाह के कुछ समय पश्चात एक बार उसकी पत्नी अपने पीहर गई।   कुछ दिनो बाद साहुकार ने  पत्नी को लाने के लिये ससुराल जाने का विचार किया।   

संयोग से वह बुधवार के दिन अपने ससुराल चला गया।  वहाँ पहुँच कर वह अपने सास-ससुर से कहता है कि मेरी पत्नी को आज ही मेरे साथ विदा कर दीजिये।  

यह सुनकर उसकी पत्नी के माता-पिता उसे समझाते है, कि बुधवार के दिन जाना ठीक नही होगा। ससुराल जाना या ससुराल से विदा होना अथवा कोई भी विशेष यात्रा बुधवार के दिन नही करनी चाहिये।  

परंतु साहुकार उनकी बातों पर ध्यान नही देता।  वह इन बातों पर विश्वास नही करता था। वह अपनी जिद पर अड़ा रहता है और अपनी पत्नी को ले जा कर ही मानता है।  

वह दोनो बैलगाड़ी से अपने घर की ओर चल दिये।  बैलगाड़ी कुछ् ही दूर गई थी कि उसका एक पहिया टूट गया।  अब वह बैलगाड़ी से नही जा सकते थे।  

साहुकार ने सोचा, पहले पत्नी को घर छोड़ आऊं, फिर सेवकों से  बैलगाड़ी ठीक करवा के मँगवा लूँगा।  वह दोनो अब पैदल ही घर की ओर चलने लगे।  

चलते-चलते उसकी पत्नी थक गई थी तथा उसे प्यास भी लग रही थी।  अभी उन्हें बहुत देर तक यात्रा करनी थी।  साहुकार ने पत्नी को एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिये बैठा दिया तथा वह स्वयं उसके लिये पानी लेने चला गया।  

बहुत देर इधर-उधर ढूंढने पर उसे कहीं से पानी मिल सका।  वह पानी लेकर शीघ्रता से उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ उसने अपनी पत्नी को बैठाया था।  

वहां पहुँचने पर वह क्या देखता है, कि उसकी पत्नी के पास कोई  बिल्कुल उसके ही जैसे रूप-रंग और कद काठी का व्यक्ति बैठा है।  यह देख कर वह हतप्रभ रह गया।  

वह तुरंत उसके निकट पहुँचा और बोला, कि तुम कौन हो और तुमने मेरी पत्नी के पास बैठने का साहस कैसे किया? 

वह व्यक्ति भी आवेश में आ गया, अरे! यह तुम क्या बोल रहे हो? यह मेरी पत्नी है।  अभी इसे इसके मायके से लिवा कर ले जा रहा हूँ, और तुम कौन हो जो मेरी पत्नी को अपनी पत्नी बता रहे हो?  

उसकी बात सुनकर साहुकार का क्रोध फूट पड़ा, वह बोला, अरे निर्लज्ज यह मेरी पत्नी है।  अभी इसे यहां बिठाकर मैं इसके लिये पानी लेने गया था।  

वह व्यक्ति पुन: बोला, इसे यहां तो मैं बिठा कर गया था और मैं इसके लिये जल लेने गया था तथा मैं जल ला कर अपनी पत्नी को पिला भी चुका हूँ।  

उनका विवाद बढ़ता जा रहा था।  उनका शोर सुनकर आस-पास के लोग एकत्र हो गए, जब लोगो को लगा, कि विवाद गम्भीर है तो कुछ लोग राज सैनिकों को बुला लाये।  

सैनिकों ने उन दोनो को पकड़ लिया और राजसभा में राजा के सम्मुख उन्हें प्रस्तुत कर दिया।  उन दोनो ने राजा से न्याय की गुहार लगाई।  राजा दुविधा में पड़ गया।  साहुकार की पत्नी भी उन दोनो में से अपने असली पति को पहचानने में असमर्थ हो गई थी।  

अंतत: राजा ने उन दोनो को बन्दी बना कर कारागृह में भिजवाने का आदेश दे दिया।  यह सुनकर साहुकार ईश्वर से प्रार्थना करने लगा, हे प्रभु, मुझसे जो भी भूल हुई है उसे क्षमा करो और मुझे इस संकट से निकालो।  
उसकी करुण प्रार्थना के फलस्वरूप आकाशवाणी हुई, हे साहुकार! तूने अपनी पत्नी के माता-पिता के समझाने पर भी उनकी बात नही मानी तथा बुधवार को पत्नी को ससुराल से लेकर विदा हुआ, इसी कारण बुद्ध देव ने रुष्ट होकर तुम्हें इस संकट में डाला है।  

यह सुनकर साहुकार ने बुद्ध देव से प्रार्थना की, हे बुद्ध देव! मेरे अपराध को क्षमा करें, मैं जीवन में कभी भी बुधवार के दिन कोई भी यात्रा नही करूंगा तथा जीवन पर्यन्त बुधवार को आपकी पूजा तथा व्रत करूंगा।  

उसकी प्रार्थना सुनकर बुद्ध देव प्रसन्न हो गए।  तभी उसका जैसा दिखने वाला वह दूसरा व्यक्ति अन्तर्ध्यान हो गया।  उसके अन्तर्ध्यान होते ही सब चकित रह गए।   
राजा को तथा सभी लोगो को सब कुछ समझ आ चुका था।  राजा ने साहुकार तथा उसकी पत्नी को सम्मान सहित उनके मार्ग की ओर छुड़वा दिया।  थोड़ी ही देर में साहुकार को मार्ग में अपनी बैलगाड़ी भी मिल गई।  
वह यह देखकर चकित रह गया कि बैलगाड़ी का पहिया भी बिल्कुल ठीक था।  साहुकार ने मन ही मन बुद्धदेव को प्रणाम किया तथा पत्नी के साथ बैलगाड़ी में बैठ कर घर की ओर प्रस्थान किया। 

साहुकार तथा उसकी पत्नी जीवन भर बुधवार का व्रत करते हुए सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते रहे।  बुद्ध देव की कृपा से उनके जीवन सुख-सौभाग्य से परिपूर्ण हो गया। 

बुधवार व्रत विधि

बुधवार के व्रत का प्रारंभ किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में ही करें।

बुधवार के कम से कम सात व्रत अवश्य रखें।

बुधवार के दिन पूजा के स्थान पर भगवान गणेश तथा बुद्धदेव की प्रतिमा स्थापित करें।

बुद्ध ग्रह को अपनी कुंडली में प्रभावी करने के लिये ज्योतिष के अनुसार हरे रंग का प्रयोग करना चाहियें, इसलिये बुधवार के व्रत के दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करें।

गणेश जी तथा बुद्ध देव के समक्ष धूप तथा घी का दीपक जलाएं।

गणेश जी को पान, सुपारी अर्पित करें।

गणेश जी तथा बुद्ध देव को हरे रंग के फूल, फल, मिष्ठान्न अर्पित करें।

इस दिन बुध ग्रह की दशा सुधारने के लिये हरे रंग के फल सब्ज़ियों का दान करना चाहियें तथा गाय को हरा चारा खिलाना चाहियें।

व्रत के दिन केवल एक समय संध्याकाल में भोजन करें तथा केवल मीठा भोजन ही करें।










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